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jangbahadur rana

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· 1 Months ago

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Question:

निर्देश:  गद्यांश को पढ़कर निम्‍नलिखित प्रश्‍नों के उत्‍तर दीजिए।


सभ्‍यता के विकास में हमारे बाहरी जीवन की सुख-सुविधा और समृद्धि के साथ-साथ आंतरिक जीवन की समृद्धि भी बढ़ती जा रही है और बढ़ती रहेगी। यदि यह न हुआ तो बाह्म सभ्‍यता बालू की भीति से भी दुर्बल रहेगी। विद्यमान वैज्ञानिक सभ्‍यता के सम्‍मुख भय और संकट यही है कि आज हमारा धरातलीय जीवन जितना वैभव-सम्‍पन्‍न है, हमारा भीतरी जीवन उतना ही दरिद्र है। फलत: स्‍नेह, सेवा, सम्‍मान, समर्पण की भावना से समृद्ध, परिपक्‍व और तपे हुए पवित्र प्रेम को बात सोचना हमारे लिए असम्‍भव हो गया।

हम भारतीय क्षुद्रताओं में आवृत्‍त होते जा रहे है। देश के हित को हमने कोसों पीछे छोड़ दिया है। जातीय गरिमा और अपनी ऐतिहासिक परम्‍पराओं का भी दम वहीं तक भरते है जहाँ तक उससे हमारा उल्‍लू सीधा होता है। 'स्‍वार्थ' की परिभाषा को हमने अत्‍यन्‍त सीमित कर दिया है। उसमें अपनी जाति-बिरादरी से बाहर वालों के लिए कोई स्‍थान नहीं रह गया है। परिजनों के हित में संघर्ष होने की स्थिति में हम जाति-बिरादरी को भूल जाते है। स्थिति इतनी दयनीय हो गयी है कि निजी स्‍वार्थ में बाधा आने से जाति-बिरादरी या प्रियजनों की कौन कहे, बाप-बेटे का और बदले में बेटा बाप का गला काटने को उद्यत हो जाता है। व्‍यक्‍तिगत महत्‍वाकांक्षा व्‍यक्‍ति को कितना नीचा गिरा सकती है। आज के युग में इसकी कल्‍पना करना भी कठिन है।

उपर्युक्‍त अवतरण का उपर्युक्‍त शीर्षक होगा

Options:
A) सभ्‍यता की उन्‍नति और मानव
B) भारत की सबसे बड़ी समस्‍या
C) व्‍यक्‍तिगत स्‍वार्थ की बढ़ती प्रवृत्त्‍ित
D) सभ्‍यता का वर्तमान संकट
Solution:
Ans: (d) 

उपर्युक्‍त अवतरण का उपर्युक्‍त शीर्षक सभ्‍यता का वर्तमान संकट होगा। 

Knowledge Expert

· commented

· 1 Months ago

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